Sunday, December 7, 2008

खबर में मैं ...



उस रात का गवाह
रात दस बजे के आस पास मुंबई सेंट्रल बुलेटिन की तैयारी कर रहा था ... तभी अचानक आज तक पर कैफे लियोपोल्ड में गोलियां चलने का फ्लैश देखा ... सुनील सिंह घर जाने की तैयारी में थे ... उनसे कहा सर चेक कर लीजिए ... तभी अचानक दीप्ति अग्रवाल का उल्लास जी के पास फोन आया ... वो वीटी स्टेशन पर अपने परिजनों को छोड़ने गई थीं ... उन्होंने बताया स्टेशन पर फायरिंग हो रही ... उल्लास जी उनसे जानने की कोशिश में थे ... कैफे लियोपोल्ड या वीटी? माहौल गरमाता जा रहा था ... मैंने सुनील जी को वीटी रवि जी को भी देखने को कहा ... तभी एक स्ट्रिंगर का फोन आया कि वाडीबंदर में एक टैक्सी में विस्फोट हुआ है ... सोचा जल्दी से वीटी स्टेशन के रात के विजुएल्स अपलिंक करवा दूं ... अजय निकल चुका था ... स्टेशन के पास ... उसका फोन आया ट्रेन नहीं चल रही है ... तभी अभिषेक सर का फोन आया मैं दफ्तर आ रहा हूं ...
मैंने उल्लास सर से कहा मैं ... वाडीबंदर निकल रहा हूं ... कैमरा मैन को साथ लेकर मैं निकल पड़ा ....

खौफनाक रात ...

वीटी स्टेशन के सामने से पुलिस वालों ने गुजरने नहीं दिया ... टाइम्स के पीछे वाली सड़क से हम जा रहे थे ... रात अजीब सी सर्द थी ... ११.१५ का वक्त होगा ... तभी अचानक दो पुलिसवालों ने मुझ पर पिस्तौल तान दी ... माइक निकाला ... आईकार्ड दिखाया ... तब जाकर आगे निकल पाया ... लेकिन तब तक अंदाजा हो गया था ... वो फ्लैश जेहन में घूम रहे थे ... खौफ की तस्वीर कुछ साफ हो रही थी ... वाडीबंदर में टैक्सी के पुर्जे देखे तो बारूद की ताकत का अंहसास हुआ ... टैक्सी में सवार तीन लोगों में कुछ बचा था ... तो टैक्सी का नंबर प्लेट और टैक्सी ड्राइवर की एक टांग ...
वहां से कुछ विजुएल्स लेकर निकला ... रास्ते में सेंट जार्ज अस्पताल था ... धर्मेन्द्र ने गुजारिश की थी पहले जेजे अस्पताल जाने की ... लेकिन मैंने सोचा सबसे पहले ... यहीं एक चक्कर मार लूं ... आखिर वाडीबंदर के सबसे नजदीक यही अस्पताल था ... अस्पताल में कोई और मीडियकर्मी मौजूद नहीं था ... लेकिन लोगों के गुस्से को देखते हुए अंदर कैमरा ले जाने की मेरी हिम्मत नहीं थी ... फिर भी घायलों की तादाद के बारे में पता करने अंदर जाना जरूरी था ...
अस्पताल के अंदर घुसते ही खबर बड़ी हो गई ... फर्श पर खून था ... दायीं ओर कतार में इतनी लाशें को दो पल के लिए मेरे पैर वहीं जम गए ... बच्चे औरतें ... सब ...
फौरन बाहर आया ... लाशों की एक गिनती कर चुका था ... तब तक इक्का दुक्का लोगों के मौत की पुष्टि हुई थी ... दफ्तर फोन किया ... अजय को खबर बताई ... सारे लोग चौंक पड़े ... किसी को यकीन नहीं हो रहा था ... सबने मुझसे दुबारा देखने को कहा ... लेकिन जो मंजर मैंने देखा था उसमें चूक की गुंजाइश नहीं थी ... मामला सिर्फ आंकड़ों का नहीं था ... फिर फोनो का दौर शुरू हुआ ... थोड़ी देर बाद वापस अंदर जाने की हिम्मत जुटाई ... घायलों के बारे में मालूमात हासिल करनी थी ... वार्ड नंबर ३,५.७ ... कराहते हुए लोग ... पट्टियां ... कुछ घायल बगैर तीमारदारी के ...
वापस नीचे आया ... तभी अजय का फोन आया ... पीटीआई मरने वालों की संख्या ५० से ऊपर बता रही है ... चेक करो ... अब अंदर जाना थोड़ा मुश्किल हो चुका है ... आतंकियों के खुले आम घूमने की खबर वहां पहुंच चुकी थी ... फिर भी किसी तरह अंदर पहुंचा ... सारी लाशें अब एक पर्दे के पीछे सरका दी गई थीं ... वहीं दीवार की ओट से फिर अंदर जाना पड़ा ... एक पल को ऐसा लगा शरीर सुन्न हो रहा है क्योंकि पांव कई लाशों के ऊपर से गुजर रहे थे ... कई लाशें बुरी तरह क्षत-विक्षत थीं ... इस बार आंकड़ा ५० से ऊपर जाकर ठहरा ... बाहर आया दफ्तर को सूचना दी ... तब तक खबर आई गिरगांव एनकाउंटर की ... यहां पहुंचने तक सुनील जी भी वहां पहुंच चुके थे .... फिर शनिवार सुबह तक अस्पताल ... ताज ... दफ्तर ... यही रूटीन था ... इन आंकड़ों और पेशे की जरूरत के बीच कुछ स्पिलंटर मेरे दिल में भी चुभे रह गए ... जिन्हें अब निकालना जरूरी हो गया है ...

२६ नवंबर की रात मेरे लिए मुंबई की सबसे डरावनी रात थी ... इतना डर उस पिस्तौल या ताज के अंदर चल री गोलीबारी से भी नहीं लगा था ... इस शहर में कान शोर को सुनने के आदी हैं .... यहां का सन्नाटा कितना खौफनाक है ये २६ नवंबर को ही पता लगा ... गिरगांव चौपाटी के पास लहरों भी गुमसुम थी ... उस रात ने और आने वाली कुछ और रातों ने कुछ सोचने का मौका नहीं दिया ... लेकिन यकीन मानिए अब हर दिन हर रात वो चेहरे ... वो खून आंखों के सामने नाचता है ... तीन दिनों के बाद बहुत कुछ देखा ... टीवी पर बहस ... सुरक्षा में लापरवाही की सुर्खियां ... राजनीति का नंगा नाच ... सत्ता की डुगडुगी ... उसपर कुर्सी के लिए बेशर्मी का नाच नाचते राजनेता ...
६ दिसंबर को ही नारायण राणे की प्रेस कांफ्रेस में शिरकत की ... तमाम राजनेताओं को गरियाने के बीच एक बार उन्होंने भी शहर के हालात का जिक्र कर दिया ...
बेशर्मी की हद है ... राणे का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रहा हूं कि वो रूठे ... साफ किया कि लाश पर भी राजनेताओं के लिए कुर्सी की अहमियत क्या होती है ... वैसे इस हमाम में कौन कौन नंगे हैं ... ये बताने की जरूरत नहीं ...
कुछ दिनों से अब कसाब का पोस्टमार्टम हो रहा है ... कहां से आया ... सबूत क्या हैं ... वो पाकिस्तानी है??
क्या हमें पाकिस्तान से लड़ाई करनी चाहिए ??? क्या युद्ध समाधान है ???
जेहन में ब्रेख्त की कुछ लाइनें घूम रही हैं ...

ये युद्ध जो आ रहा है ...
पहला युद्ध नहीं होगा ...
इससे पहले भी कई युद्ध लड़े जा चुके हैं ...

वाकई इससे पहले भी कई युद्ध लड़े गए ... नतीजा ??? कौन खुशहाल हुआ ... किसी शांति मिली ???...

ये सवाल कई बातों में उलझा देते हैं ...

खैर मैं जिक्र उस रात और आज का कर रहा था ...

भूल नहीं पा रहा हूं ... ट्रेन पर चढ़ते रात में दफ्तर से निकलते हर वक्त खटका रहता है ... शहर ने तीन बड़े हादसों से बचा लिया ... २६ जुलाई ... ट्रेन धमाके और अब ... क्या पता खबर लिखने वाले ये हाथ ... कुछ दिनों बाद खुद खबर बन जाएं ... या शायद नहीं ...

शायद मेरी तरह इस शहर ने कईयों को डरा दिया है ... मेरे फ्लैट के ऊपर ही सारस्वत जी का मकान है ... जो होटल ताज में कमांडो या आतंकियों की गोलियों का शिकार हुए इस पर संशय है ... घरवालों का मातम ... नश्तर की तरह हर वक्त चुभता है ... बिल्डिंग के गेट पर एनसीपी ने उनकी बड़ी तस्वीर लगा रखी है ...

डर .... मातम ... कई सारी भावनाएं हैं ...
लेकिन इतना तय है आठ साल के करियर में पहली बार कोई खबर सिर्फ खबर नहीं रह गई है ...
साए की तरह ये मेरे साथ है ... हर वक्त ... हमेशा ...

Tuesday, May 20, 2008

खत्म हुई तेंडुलकर की पारी ... 1928-2008



खामोश ... अदालत जारी है ... ये अदालत है सच की ... ये अदालत है एक निडर शख्स की ... यहां उसकी मौत पर भी रोना मना है ... नहीं तो घासीराम कोतवाल हवालात में बंद कर देगा ...

पर विजय आज आपकी अदालत में हुक्मउदली होगी ... आज हम यहां चीखेंगे ...
दिमाग हुक्म मानता है ... पर आंखें कभी किसी की गुलाम हुई हैं ...
वो देखती हैं ... आपका जाना उन्हें खटक रहा है ... सवाल दिल में उमड़ रहे हैं अब कौन उस शिद्दत से कह सकेगा कि मैं अगले जन्म में भी लेखक ही बनना चाहूंगा ...
यकीनन ये जवाब सच का था ... उस निर्भीक शख्स का था जो चौदह साल की उम्र में जंग-ए-आज़ादी का परचम लहरा रहा था ... जिसने गरीबी के बावजूद कलम थामकर बटुए की फटकार को सहा लेकिन समझौता नहीं किया ... जिसने नरेन्द्र मोदी को गोली मारने की हसरत रखी ... जिसने खुलेआम एक संपादक को मनोहर जोशी जैसे भ्रष्ट नेता से सम्मान न लेने की नसीहत दी ...
कई लोग आपसे असहमत रहे ... अहसमति जरूरी भी है ... असहमति आपको पसंद भी थी ... यहीं से विचारों की कतारें खुलती हैं...

यही कतारें लोकसत्ता के एक पत्रकार को रामप्रहर के दरवाजे तक ले आई ...

माफ करना ... आंखें आपके आदेश को मान नहीं रही हैं ... खामोश अदालत में भी फूट-फूट कर रो रही हैं ... इसी आस के साथ कि आप यकीनन लौट कर आएंगे ... एक नए नाम ... एक नए शरीर के साथ ... नए दौर के लेखक के रूप में ... अभी बहुत सारे काम करने हैं ... मुझे अभी आपसे मिलना भी है ...
लेकिन इस बार किताबों के जरिए नहीं ...

आप मेरे लिए इनमें आज भी जिंदा हैं ... मेरे लिए आपका हर जन्मदिन
गृहस्थ ( 1947)
श्रीमंत (1956)
खामोश अदालत जारी है (1967)
सखाराम बाइंडर (1972)
घासीराम कोतवाल (1972)
कन्यादान (1983)
सफर (1991)

Sunday, December 2, 2007

मोदी के मार्क्सवादी




पूरे देश में फील गुड है ... हालांकि इस बार ये फील गुड भाजपा का नहीं है ... वामपंथियों और उनकी बैसाखी पर चलने वाले प्रधानमंत्री का है। सरकार नहीं गिरेगी ... परमाणु करार पर वामपंथी शीर्षासन मार चुके हैं ...सत्ता के लिए ऐसे राजनीतिक सियारपन ... लेकिन इनको शर्म नहीं आएगी ... खैर शर्म तो वामपंथियों को कभी आई भी नहीं है। गुडगांव में मजदूर पिटे तो संसद नहीं चलने दिया लेकिन नंदीग्राम में मजदूर किसानों की लाशें गिरा दी गई ... महिलाओं को बेआबरू किया गया ... सीआरपीएफ चीखती रही भई हमें उपदवग्रस्त इलाकों में भेजो ... लेकिन ये मोदी छाप मार्क्सवादी कान में तेल डालकर बैठे रहे ... आखिर काडर का जो सवाल था।
यदि बंगाल में सीपीएम की सरकार नहीं होती तो शायद कांग्रेस उसे कब का भंग कर चुकी होती ... लेकिन सत्ता की मजबूरी ... उसे वामपंथियों के मुंह में ठूंसने के लिए नंदीग्राम से अच्छा लॉलीपॉप मिल ही नहीं सकता था। यही वजह थी कि दस दिन के शीतकालीन सत्र में प्रधानमंत्री विदेश यात्रा के लिअ रवाना हो गए ... कौन बैर मोल ले .... खैर इस स्थानीय मसले ने एक बार फिर साफ कर दिया कि भारत के मार्क्सवादियों का कोई चरित्र नहीं है ... वो भी महज ऐसी राजनीतिक जमात का हिस्सा हैं जो सत्ता के लिए मेरी कमीज तेरी कमीज से सफेद है का खेल खेलते हैं।
एक छात्र के रूप में मैंने भी मार्क्स और उनके संशोधित संस्करण स्टालिन और लेनिन को पढ़ा लेकिन उनके भारतीय भक्तों ने नंदीग्राम और सिंगूर संस्करण पेश किया है वो मार्क्सवाद से जरा सी भी सहानुभूति रखने वाले को परेशान कर रहा है। सर्वहारा को सर्वहारा का दुश्मन बताने वाला ये मार्क्सवादी मॉडल मार्क्स के दर्शन में कहीं नजर नहीं आता हां भारत में इसे सत्ता का नया मार्क्सवादी दर्शन जरूर कहा जा सकता है। हद है जिस अंग्रेजी मीडिया ने पांच सालों तक गुजरात को खोजी पत्रकारिता का आधार बनाए रखा वो भी नंदीग्राम के मसले पर चुप बैठा है। कहां है कैमरे की वो आंख जो किसी कैम्प में नहीं गई ... जिसे मां के सामने बेटी का बलात्कार दिखाई नहीं दिया ... किसानों की चीखें सुनाई नहीं दी ... और ये सब हुआ पुलिस के सामने ... मोदी छाप मार्क्सवादियों के राज में ... खैर ३० साल से गद्दी मिली है... तो बाप का राज तो होगा ही।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि नंदीग्राम में लाश किसकी गिरी ? भाजपाई की ? संघ के किसी नुमाइंदे की ? नहीं ... वो लोग गरीब मजदूर किसान थे,लेकिन सत्ता में शामिल नहीं ... ३० सालों से लाल सलाम ठोंक रहे थे इस इंतजार में कि कभी सर्वहारा राज आएगा ...
जिस जमीन बंटवारे का दंभ वामपंथी भरते थे उसे उन्होंने ही छिन लिया ... गोली के दम पर ... शर्म भी नहीं आई ... माफ करना भूल गया था कि शर्म शब्द आपके शब्दकोश में है ही नहीं ... होती तो तीस साल से अपने राज्य को गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी से निजात न दिला पाने का दर्द आपको रोने पर बिलखने पर मजबूर करता ... खैर आपसे क्या शिकायत करें कोलकाता में हाथ रिक्शा खींचने वाले मजदूरों का पसीना आप पोंछ नहीं पाए ... दिल्ली जाकर घड़ियाली आंसू बहाना आपकी नजर में क्रांति है ... तो हो ...
कई वामपंथियों से मुझे संवेदनशीलता की उम्मीद होती थी जब गोधरा को सस्वर गरियाते थे ... लेकिन नंदीग्राम पर उन्होंने ऐसा यू टर्न मारा है ... अनिलजी कि एक बात याद आती है कि वाकई संघी और वामपंथी बाल विवाह कराते हैं ... एक बार जो घुट्टी पिला दी उससे अच्छे बुरे का फर्क ही आदमी भूल जाता है। आज जब मेधा पाटेकर, महाश्वेता देवी सरीखे लोग वामपंथियों को गरिया रहे हैं तो वो ऐसी अजीम शख्सियतों को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं ... चर्चा करो तो बस उनकी आंखे भी सुर्ख लाल दिखाई देती हैं ... जवाब देते हैं कि पहले तृणमूल ने नक्सलवादियों के साथ मिलकर उनके कार्यकर्ताओं को जमीन से बेदखल किया ...
तो साहब आप पुलिस के पास जाते ...
शिकायत करते ... सरकार तो आपकी थी ...
महिलाओं के साथ बलात्कार ... मासूम बच्चों और निरीह किसानों के कत्ल का अधिकार आपको किसने दिया ...
वाकई मोदी का विरोध करते करते आप लोग
मोदी के मार्क्सवादी हो गए हैं।

Monday, November 5, 2007

उधार की पढ़ाई ...


डीएमके प्रमुख भी लगता है अंग्रेज इतिहासकारों की ही झूठन खाकर बड़े हुए हैं ... रामचरितमानस को उद्धृत कर सीता को राम की बहन बताना हास्यास्पद ही नहीं बल्कि मूर्खतापूर्ण है। मानस कई लोगों ने पढ़ी होगी क्या वो कोई भी ऐसी चौपाई या छंद बता सकते हैं?
सबसे पहले मैं ये साफ कर दूं कि मैं हिन्दू धर्म का पैरोकार नहीं हूं ... लेकिन ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें किसी राज्य के मुखिया को भला शोभा देती हैं?
कुछ दिनों पूर्व जेएनयू के छात्र संघ चुनावों में भी एक सज्जन ने भी भगवान राम के बारे में ऐसी ही टिप्पणी दी थी ... मेरा ऐसे लोगों से बस एक ही सवाल है कि क्या हम दस पंद्रह पीढ़ी पहले से अपने पूर्वजों के अस्तित्व का कोई भौतिक प्रमाण दे सकते हैं? समय के साथ साथ हर प्रमाण मिटता है और यहां तो घटना १७ लाख साल पुरानी है। राम के चरित्र जैसी घटनाएं भी वाचिक रूप में पीढ़ियों से चली आ रही हैं। राम सेतु जैसे कई प्रमाण सामने हैं जिनके माध्यम से उनकी प्रमाणिकता जुटाई जा सकती है ... लेकिन यहां तो लोग साक्ष्य नष्ट करके ही कहना चाहते हैं कि साक्ष्य उपलब्ध ही नहीं हैं।जिन इतिहासकारों की पढ़ाई पट्टी हम पढ़ रहे हैं उन तात्विक विद्वानों की जानकारी तो दो सहस्त्र वर्षों से ज्यादा नहीं है ... क्योंकि उससे पहले उनके लिए किसी विकसित सभ्यता का अस्तित्व था ही नहीं ... उन सभ्यताओं का भी नहीं जिन्हें खुद उन्होंने अपने हाथों से नष्ट किया है। बचपन से हमें पढ़ाया गया कि आर्य बाहर से आए थे हमने मान लिया .,.. प्रमाण कौन मांगता?
जिनके हाथों में पुरातत्व और इतिहास को बांचने का जिम्मा है वो आज भी विदेशी शिक्षा के ही आसरे हैं ... गाहे बगाहे लोग नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया का भी रोना रोते हैं ... लेकिन ये तो सोचना ही पड़ेगा कि हम नेहरू की किताब को प्रमाणिक मानें या फिर वाल्मीकि की रामायण और अपने वेद उपनिषदों को ...

Wednesday, October 31, 2007

अंतिम इच्छा ...


मैं जिंदगी भर इतना जला इतना जला
कि
मरने के बाद जलाने की जरूरत नहीं
मैं आंसुओं में इतना डूबा इतना डूबा
कि
अवशेष को गंगा में बहाने की जरूरत नहीं
जिंदगी भर मेरी इज्जत दो गज कपड़े के पीछे भागती रही
हो सके तो मेरी लाश पर एक कफन डाल आना

Thursday, October 11, 2007

कुछ खुद पर ...


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कल इस्तीफा दिया, प्रत्याशित था कि बॉस से घुड़की पड़ेगी ... सो फोन आने के बाद कान तैयार थे ... लेकिन अगले दो तीन मिनट तक कानों में जो शहद घुलता रहा उससे चौथे खंभे के संरक्षक समाजवादियों का साम्राज्यवाद खुलकर सामने आ गया पेश है कुछ झलकियां ...

तुम्हें मैं प्रिंट से उठा कर लाया ... तुम्हारे लिए कितने लोगों ने मुझे फोन किया ... आइंदा से कभी मुझे फोन मत करना ...

और भी कुछ कुछ !!!!!

ऐसा लगा कि गोया, प्रिंट वो भी पीटीआई जैसी संस्था में काम करना कोई ऐसा पेशा हो जिससे दो बाइट में खुद को समेटे लोग दोयम दर्जे का मानते हैं, ऐसी कई बातें दिमाग में भरे जा रही थीं ... सोचने पर मजबूर हो रहा था कि क्या मैं सिफारशी लाल हूं ... इस संस्था में आने से पहले मुझे एक प्रश्न पत्र दिया गया था जिसके सारे सवाल मैंने हल किए ... कॉपी लिखने में अपनी तरफ से कोई गलती नहीं की ... ढाई साल के सफर मैं कई दिन और रात बगैर छुट्टी की परवाह किए समर्पित किए ...

फिर ऐसी बातें ???? ...

मजे कि बात ये है कि जो सूरमा मेरे इस्तीफा देने से हत्थे से उखड़ रहे थे उन्होंने खुद भी कई घाट का पानी पिया हुआ है, फिर क्या उन्होंने ये काम भविष्य में आगे बढ़ने के लिए नहीं किया ???

भई, हम किसी सरकारी नौकरी में तो हैं नहीं जो वैकेन्सी निकले हम फॉर्म भरें और कोई स्वस्थ प्रतियोगिता के जरिए नौकरी मिल जाए ... इन साहब ने भी किसी से बात की होगी किसी अंदरवाले!! को खाली जगह के बारे में पता लगाने को कहा होगा ... फिर एप्लाई किया होगा ...

फिर मेरे ऐसा करने पर मैं उनके रहमोकरम पर पला बढ़ा ... कैसे ???? ये सवाल मुझे कचोटता जा रहा था ... जिस संस्था से वो मुझे उठा कर लाने की बात कर रहे थे उसमें तकरीबन देश के हर कोने से हजारों परीक्षार्थी बैठते हैं, तीन घंटे की परीक्षा होती है फिर महीनों के इंतजार के बाद रिजल्ट आता है ... फिर तीन संपादकों के पैनल के सामने आपका इंटरव्यू होता है ... और यकीन मानिए इसका स्तर ऐसा होता है जिसमें इन महानुभाव के कई शेर घास खाने को मजबूर हो जाएंगे।

बहरहाल कहते हैं कि तरक्की आदमी के सिर चढ़ कर बोलती है ... लेकिन यहां तो तरक्की आदमी के एक नहीं दस सिरों पर चढ़ बैठी है ... उसे दशानन बनने पर मजबूर कर रही है ... लेकिन शायद हमारे आका !!!! एक बात भूल जाते हैं कि घमंड दशानन का तक नहीं टिका फिर हम और आप क्या चीज हैं। इन्हें शायद इस बात का भी इल्म नहीं रहता कि हम इनके नीचे नहीं बल्कि इनके साथ काम करते हैं ... लेकिन क्या करें पापी पेट कभी विरोध नहीं करता ... कभी नहीं कह पाता कि संविधान ने हमें भी 19 (1) a दिया है ... हम भी बराबर के हैं ... या यूं कहें कि हां हम कमजोर हैं ... जवाब मुंह पर नहीं दे पाया तो कलम की आड़ में खुद को छिपा लिया।

कुल मिलाकर ऐसे घमंडी लोगों के लिए कॉलेज के दिनों का एक जुमला याद आता है कि

तुम करो तो रासलीला, हम करें तो छेड़खानी ....

Tuesday, October 2, 2007

इंसान या महात्मा?


गांधी जयंती ... दो फूल ... चंद गाने ... हो गई इतिश्री।

कई लोग गांधी पर बहस मुबाहिसे की मांग करते हैं लेकिन गांधी को महात्मा मानने वाले इसे दरकिनार कर देते हैं और यहीं से मिलता है गांधी विरोधियों को संबल। दरअसल सारी दिक्कत यहीं से शुरू होती है संस्कार ऐसे मिले हैं कि महात्माओं पर मीन-मेख आप निकाल नहीं सकते, लेकिन अगर गांधी को आप इंसान के रूप में सोचेंगे तो वाकई आपको उनकी शख्सियत बहुत बड़ी जान पड़ेगी।

कई लोगों को लगता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को हरिपुर इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बावजूद गांधी का उनके प्रति विरोध गलत था, लेकिन क्या कोई इंसान किसी के विचारों को सही नहीं मानता या फिर उसे वो पसंद नहीं है तो उसका कद कम हो जाएगा?

कई समझदार भगत सिंह की मौत के लिए भी गांधी को जिम्मेदार मानते हैं ... मेरा उनसे एक ही सवाल है कि क्या एक व्यक्ति के लिए पूरे स्वतंत्रता संग्राम को ताक पर रखा जा सकता था ? यकीनन भगत सिंह बहुत बड़े क्रांतिकारी थे और अगर उन्हें जान ही बचानी होती तो वो बम फेंककर भाग सकते थे ... लेकिन उनका मकसद एक ही था धमाका !!!! फिर गांधी के जरिए भीख में मिला जीवन क्या उन्हें स्वीकार होता ?

देश भर को दिखाने के लिए हममें से कितने लोग आधे पैर तक धोती बांध कर घूम सकते हैं ... कौन देश, उसूलों और न्याय की खातिर अपने बेटे तक का पक्ष लेने से चूक सकता है .... कौन आजादी के जश्न में भी बंगाल के सुदूर गांव में जाकर हिंसा की आग बुझा सकता है ... कौन गांधी की आत्मकथा जैसी सच्चाई को लिखने का साहस कर सकता है ...

अगर आप में से कोई तो मेरे लिए आप भी महात्मा हैं ...

और अगर नहीं तो कृप्या गांधी को कोसने से पहले अपने गिरेबान में झांक लें तो आप ये जरूर मानेंगे कि गांधी महात्मा न सही एक बहुत बड़ी शख्सियत तो जरूर थे।